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अत्यधिक स्नान कराया तो भगवान जगन्नाथ पड़ गए बीमार

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रायपुर,

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ज्येष्ठ पूर्णिमा पर राजधानी के सभी जगन्नाथ मंदिरों में भगवान जगन्नाथ, मैय्या सुभद्रा और भैय्या बलदाऊ की प्रतिमाओं को पवित्र नदियों के जल से स्नान करने की परंपरा निभाई गई। श्रृंगार करके दोपहर में महाआरती की गई। मान्यता है कि अत्यधिक स्नान करने से भगवान बीमार पड़ जाते हैं, इसलिए इस परंपरा का पालन करते हुए रात्रि में पुनः महाआरती करके मंदिर के पट 15 दिनों के लिए बंद कर दिए गए हैं। अब भक्तगण 15 दिनों तक भगवान के दर्शन नहीं कर सकेंगे। भगवान के बीमार रहने के दौरान औषधियुक्त काढ़ा पिलाने की रस्म निभाई जाएगी। मंदिरों में आषाढ़ अमावस्या यानि दो जुलाई से लेकर द्वितीया तक तीन दिवसीय महोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। तीसरे दिन 4 जुलाई को भगवान रथ पर विराजित होकर नगर भ्रमण करने निकलेंगे।

टुरी हटरी का प्राचीन मंदिर

टुरी हटरी स्थित ऐतिहासिक श्रीस्वामी जगन्नाथ मंदिर के महंत रामसुंदर दास के सानिध्य में पंडितों ने पवित्र नदियों के जल से तीनों भाई-बहन यानि जगन्नाथ, सुभद्रा और बलदेव की प्रतिमाओं (विग्रह) का विधिवत मंत्रोच्चार के साथ स्नान कराया। इसके पश्चात श्रृंगार और आरती की गई। इसमें पं रामनुजलाल उपाध्याय, प्रोफेसर व्ही.पार्थ सारथी राव, विजय पाली, पं कृष्णवल्लभ शर्मा, दाऊ महेन्द्र अग्रवाल, अरुण साहू, रामतीरथ दास, रामछवि दास, उमेशपुरी, रामेश्वर मिश्रा, कान्हा उपाध्याय, प्रकाश ठाकुर, पुजारी राम तिलक दास आदि शामिल थे।

गायत्री नगर में महाआरती में उमड़े

गायत्री नगर स्थित जगन्नाथ मंदिर के संस्थापक पुरंदर मिश्रा के सानिध्य में पंडितों ने सुबह 10 बजे भगवान के स्नान करने की परंपरा निभाई। दोपहर में श्रृंगार करके महाआरती की गई। रात्रि में पुनः महाआरती करके मंदिर के पट बंद कर दिए गए। महाआरती में काफी संख्या में भक्तगण शामिल हुए।

अनेक मंदिरों में छाया भक्तिभाव

सदरबाजार स्थित मंदिर के सर्वराकार ओमप्रकाश पुजारी के नेतृत्व में संपूर्ण पुजारी परिवार के सदस्य और भक्तगणों ने स्नान की परंपरा निभाई। इसके अलावा अश्विनी नगर, गुढ़ियारी, आमापारा, पुराना मंत्रालय, कोटा स्थित राम दरबार आदि मंदिरों में भी ज्येष्ठ पूर्णिमा पूजा पर भक्तिमय माहौल छाया रहा।

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हालचाल जानने भक्त आएंगे मंदिर, नहीं कर सकेंगे दर्शन

गायत्री नगर मंदिर के संस्थापक पुरंदर मिश्रा ने बताया कि 15 दिनों तक बीमार अवधि में पट बंद रहने के दौरान भक्तगण भगवान का हालचाल पूछने मंदिर आएंगे। हालांकि, भगवान का दर्शन नहीं कर पाएंगे, लेकिन मुख्य द्वार पर मत्था टेककर मन्नत मांगेंगे। ऐसी मान्यता है कि भगवान की बीमार अवधि में जो भक्त मंदिर में आकर मत्था टेकते हैं उन पर भगवान की विशेष कृपा होती है।

काढ़े का प्रसाद लेने आएंगे भक्त

किसी मंदिर में पंचमी तो किसी में नवमी, एकादशी, अमावस्या तिथि पर भगवान को काढ़े का भोग लगाया जाएगा। ऐसी मान्यता है कि भगवान को लगाए गए काढ़े के भोग का प्रसाद ग्रहण करने से भक्तगण सालभर तक निरोगी रहते हैं। इस मान्यता के चलते मंदिरों में कई भक्त काढ़े का प्रसाद ग्रहण करने पहुंचेंगे।

नेत्रोत्सव के बाद नगर भ्रमण करेंगे भगवान

तीन दिवसीय उत्सव का शुभारंभ दो जुलाई को अमावस्या तिथि से होगा। इस दिन काढ़ा पिलाने की रस्म का समापन होगा। इसके पश्चात आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तीन जुलाई को नेत्रोत्सव पर भगवान के नेत्रों का श्रृंगार किया जाएगा। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया यानी चार जुलाई को भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भैया बलदेव के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करने निकलेंगे।

 

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